इरोम शर्मिला की हार बताती है कि ऐतिहासिक बलिदान से चुनाव नहीं जीते जाते
मणिपुर में 86 फीसदी वोट पड़े थे, लेकिन 16 साल तक ऐतिहासिक संघर्ष करने वालीं इरोम शर्मिला को सिर्फ 90 मतदाताओं का साथ ही मिल सका
दुनिया के इतिहास में ऐसा शायद ही पहले कभी-कहीं हुआ हो. वह नवंबर 2000 की बात है. मणिपुर से असम राइफल्स के साथ मुठभेड़ में 10 लोगों के मारे जाने की खबर आई थी. मालोम में हुई फर्जी मुठभेड़ की उस घटना ने 28 साल की एक युवती को भीतर तक हिलाकर रख दिया. असर ऐसा हुआ कि जिस उम्र में लोग आने वाले कल के सपने देखने और उन्हें सच करने में जुटे रहते हैं, उस दौर में वह तपस्या पर बैठ गई. भूखी-प्यासी. अपने लिए नहीं, बल्कि सिर्फ एक इतनी सी मांग लेकर कि जिस मिट्टी में वह पैदा हुई, जिसमें पली-बढ़ी, वहां के लोगों पर अत्याचार बंद हो. वह सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) हटा लिया जाए जो सुरक्षा बलों को सिर्फ शक के बिना पर ही किसी को गिरफ्तार कर लेने और गोली मारने तक की इजाजत दे देता है.
इसके बाद पूरे 16 साल तक इरोम शर्मिला अकेले लड़ती रहीं. इस दौरान उनके तीन ही ठिकाने थे - जेल, अस्पताल या अदालत. इतने साल में वे अपनी मां से भी सिर्फ एक बार ही मिलीं. दुनिया में किसी एक शख्स के संघर्ष का यह इतिहास बन गया. लोग उन्हें ‘आयरन लेडी’ (लौह महिला) कहने लगे. आदर्श मानने लगे. मगर सरकार तो ‘सरकार’ थी न. उसने कुछ नहीं माना. सो, धुन की पक्की इस महिला ने सोचा कि वह खुद सरकारी राज-तंत्र में शामिल होकर लड़ाई आगे बढ़ाए. सो, अगस्त 2016 में इरोम शर्मिला ने भूख हड़ताल खत्म कर ऐलान किया कि वे चुनाव लड़ेंगी. आम लोगों से मिलने वाले प्यार-सम्मान पर उन्हें कुछ ज्यादा ही भरोसा जो था.
लेकिन 11 मार्च 2017 को इस भरोसे का नतीजा सामने आ चुका है. इरोम शर्मिला चानू को मणिपुर की थोबल सीट से सिर्फ 90 वोट ही मिल पाए. चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों में वे आखिरी नंबर पर रहीं. जाहिर है, जमानत भी जब्त हो गई. अभी तीन दिन बाद ही यानी 14 मार्च को 45 साल की हो रहीं इरोम को उनके अपने लोगों से जन्मदिन का यह तोहफा मिलना किसी सदमे से कम नहीं रहा होगा. तभी तो चुनाव नतीजों के तुरंत बाद उन्होंने अपनी पीड़ा जताई, ‘मैं जैसी हूं, उस तरह लोगों ने मुझे स्वीकार नहीं किया. मैं खुद को ठगा हुआ महसूस करती हूं. मैं अब राजनीति से बुरी तरह थक चुकी हूं. इसलिए अगले कुछ दिन तक आश्रम में रहकर आराम करना चाहती हूं.’ कहना न होगा कि अपने आगे के संघर्ष में वे एक बार फिर अकेली नजर आ रही है.
इरोम ने राजनीति में बड़ी उम्मीदों से कदम रखा था. पीआरजेए (पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस) नाम से पार्टी बनाई. लेकिन राज्य की 60 सीटों वाली विधानसभा के लिए उनकी पार्टी से चुनाव लड़ने को सिर्फ दो और लोग राजी हुए. यानी इरोम के समेत कुल तीन. इन लोगों ने क्राउड फंडिंग जैसे साफ-सुथरे तरीकों से बमुश्किल साढ़े चार-पांच लाख रुपए जमा किए. लेकिन उनकी यह ईमानदार कोशिश, भाजपा-कांग्रेस के भारी-भरकम संसाधनों के बीच जैसे दम तोड़ गई. दो चरणों में राज्य के 86 फीसद मतदाता वोटिंग के लिए निकले. लेकिन उनका बड़ा हिस्सा दो बड़ी पार्टियों के बीच ही बंट गया. इरोम और उनके साथियों की ईमानदारी, उनका त्याग, उन्हें अपनी तरफ नहीं खींच सका. जाहिर है, इरोम के दो साथियों की भी जमानत जब्त हो गई.
गहराई तक ध्रुवों में बंटे मणिपुर में विभाजन की खाई को और चौड़ा करने में लगी भाजपा और कांग्रेस को यहां के लोगों ने ज्यादा पसंद किया है. चुनाव नतीजों के मुताबिक सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को हुआ है. साल 2012 के चुनाव के दौरान राज्य में बमुश्किल न के बराबर उपस्थिति दर्ज कराने वाली इस पार्टी ने इस बार 20 सीटें जीती हैं. जबकि नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के चार उम्मीदवार जीते हैं. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष (दिवंगत) पीए संगमा की यह पार्टी अभी एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का हिस्सा है. एक उम्मीदवार अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) का जीता है और पांच सीटें अन्य के खाते में गई हैं.
ऐसे में पिछले 15 साल से राज्य की सत्ता पर काबिज कांग्रेस 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी भले बनी हो, लेकिन उसे सरकार बनाने के लिए संघर्ष करना होगा. क्योंकि यहां बहुमत के लिए 31 सीटें चाहिए. अगर अन्य पांच और तृणमूल के एक विधायक का समर्थन उसे मिल गया, तब भी बहुमत से दो सीटें (27+6=33) ही उसके पास ज्यादा होंगी. जानकारों के मुताबिक फिर दूसरा खतरा यह रहेगा कि भाजपा कहीं अरुणाचल प्रदेश की कहानी यहां भी न दोहरा दे, जहां वह पूरी कांग्रेस सरकार को ही भाजपामय कर चुकी है. और अब तो भाजपा के पास असम जैसे उत्तर-पूर्व के सबसे बड़े राज्य में अपनी सरकार भी है. लिहाजा, आने वाले दिनों में मणिपुर की राजनीति में काफी उठापटक देखने को मिले तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए. आखिर यह वहां के लोगों का ही फैसला है!